
राजू अनेजा,काशीपुर। डिजिटल दौर में बच्चों का बचपन जहां मोबाइल स्क्रीन तक सिमटता जा रहा है, वहीं पारंपरिक मेलों की दुनिया उन्हें असली जीवन से जोड़ने का काम कर रही है। शहर में आयोजित चैती मेला इसी कड़ी में बच्चों के लिए सीख, संस्कार और अनुभव का जीवंत मंच बना हुआ है।
डी बाली ग्रुप की डायरेक्टर उर्वशी दत्त बाली ने अभिभावकों से अपील करते हुए कहा कि बच्चों को सिर्फ मोबाइल और आधुनिक सुविधाओं तक सीमित रखना उनके विकास के साथ न्याय नहीं है। उन्होंने कहा कि जरूरी है कि बच्चों को मेले जैसी जगहों पर ले जाकर जिंदगी की असल तस्वीर दिखाई जाए।
उर्वशी बाली ने कहा कि मेले सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि बच्चों के लिए “जीवन की पाठशाला” हैं। यहां वे देखते हैं कि सीमित संसाधनों में भी लोग किस तरह मेहनत और हुनर के दम पर आगे बढ़ते हैं। छोटे दुकानदारों की लगन, कलाकारों की कला और आम जनजीवन का संघर्ष बच्चों को सिखाता है कि सफलता केवल साधनों की नहीं, बल्कि मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास की मोहताज होती है।
उन्होंने कहा कि आज के बच्चे किताबों और इंटरनेट से बहुत कुछ सीखते हैं, लेकिन असली समझ अनुभव से आती है। मेले बच्चों को न सिर्फ सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराते हैं, बल्कि उन्हें अपनी जड़ों से भी जोड़ते हैं।
उर्वशी दत्त बाली ने कहा कि मेले बच्चों के भीतर संतोष, संवेदनशीलता और हर परिस्थिति में मुस्कुराकर आगे बढ़ने की भावना विकसित करते हैं। उन्होंने अभिभावकों से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को मेले में जरूर लेकर जाएं, ताकि वे सिर्फ सपने देखना ही नहीं, बल्कि उन्हें साकार करने का रास्ता भी समझ सकें।
उन्होंने कहा कि अगर आने वाली पीढ़ी को मजबूत, संस्कारी और जीवन के प्रति जागरूक बनाना है, तो मोबाइल से बाहर निकालकर उन्हें मेले की दुनिया से जरूर जोड़ना होगा।
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