उत्तराखंड में सिमट रहा है मानसून और बदल रहा वर्षा चक्र: बागेश्वर में सामान्य से 153% अधिक बारिश, तो पौड़ी-रुद्रप्रयाग सूखे की कगार पर

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देहरादून। जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और वैश्विक तापमान में वृद्धि का सीधा असर अब मध्य हिमालयी राज्य उत्तराखंड के वर्षा चक्र पर दिखने लगा है। राज्य में वार्षिक औसत वर्षा तो लगभग सामान्य बनी हुई है, लेकिन मानसून और वर्षाकाल का समय लगातार सिमटता जा रहा है। इसका सबसे घातक दुष्परिणाम यह हो रहा है कि प्रदेश के कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में जहां अत्यधिक वृष्टि (अतिवृष्टि) हो रही है, वहीं कुछ इलाके सूखे की मार झेल रहे हैं। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, अल नीनो का वैश्विक प्रभाव और तेजी से बदलती जलवायु इसके मुख्य कारक हैं।

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली उत्तराखंड औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, भरसार के पर्यावरण विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज’ (IPCC) की हालिया रिपोर्ट का विस्तृत अध्ययन किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, हिमालयी क्षेत्रों में मौसम का मिजाज बहुत तेजी से बदल रहा है। इस वर्ष 26 जून को मानसून के आगमन से लेकर 17 जुलाई के बीच के सरकारी आंकड़े चौंकाने वाले हैं। जहां बागेश्वर जिले में सामान्य 162 मिमी वर्षा के मुकाबले 409 मिमी बारिश दर्ज की गई (जो सामान्य से 153 प्रतिशत अधिक है), वहीं पौड़ी जनपद में सामान्य 223.7 मिमी के सापेक्ष मात्र 149.4 मिमी वर्षा हुई, जो सामान्य से 33 प्रतिशत कम है। इसी तरह रुद्रप्रयाग में 31% और चंपावत में 30% कम बारिश रिकॉर्ड की गई।

“अल नीनो के प्रभाव से प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ रहा है, जिससे वैश्विक मौसम प्रणाली में भारी उलटफेर हो रहा है। उत्तराखंड में मौसम और वर्षा चक्र का यह असामान्य रूप इसी वैश्विक बदलाव और अध्ययन रिपोर्ट का हिस्सा है।”

प्रो. एसपी सती, पर्यावरण विज्ञान विभाग, भरसार विश्वविद्यालय

मैदानी जिलों में भारी बारिश, पहाड़ों में सूखा

इस मानसून सीजन में एक नया और चिंताजनक ट्रेंड देखने को मिल रहा है। जहां राज्य के मैदानी जनपदों— देहरादून (301.2 मिमी), ऊधमसिंह नगर (330.4 मिमी) और हरिद्वार (359.8 मिमी) में सामान्य से अधिक वर्षा रिकॉर्ड की गई है, वहीं पहाड़ी जनपदों— नैनीताल (259.2 मिमी), चंपावत (195.8 मिमी) और पिथौरागढ़ (248.2 मिमी) में बादल उम्मीद के मुताबिक नहीं बरसे।

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आईपीसीसी की रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि हिमालय के पर्वतीय क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के हिमनद (ग्लेशियर) बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि वर्षा के इस असामान्य पैटर्न और ग्लेशियरों के पिघलने से भविष्य में उत्तराखंड को भयंकर जल संकट, अचानक आने वाली बाढ़ (Flash Floods) और भूस्खलन जैसी भीषण प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है। इसका सीधा और प्रतिकूल असर राज्य के प्राकृतिक जलस्रोतों, पारंपरिक कृषि, जैव विविधता और स्थानीय जनजीवन पर पड़ना शुरू हो गया है।

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