जनता का हक अधर में, नेताजी जश्न में मशगूल ! गुस्से में सड़क पर उतरे ग्रामीणों ने फूंका विधायक का पुतला

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राजू अनेजा,लालकुआं/बिंदुखत्ता। बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा दिलाने के बड़े-बड़े वादे किए गए, तारीखें गिनाई गईं, वीडियो संदेश जारी हुए—लेकिन 25 फरवरी की कैबिनेट बैठक में प्रस्ताव नदारद रहा। उधर, जनता हक की लड़ाई में उबल रही थी और इधर नेताजी वैवाहिक वर्षगांठ का जश्न मना रहे थे। यही विरोधाभास अब सियासत के केंद्र में है।

गौरतलब है कि लालकुआं विधायक मोहन बिष्ट ने पहले दावा किया था कि इसी बैठक में बिंदुखत्ता को राजस्व गांव बनाने का प्रस्ताव पारित होगा। बैठक बीत गई, प्रस्ताव नहीं आया। बाद में “कागज अधूरे” होने की दलील दी गई। विपक्ष का सीधा सवाल—“अगर कागज पूरे नहीं थे, तो चार साल से जनता को भरोसा किस आधार पर दिलाया जा रहा था?”

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पुतला दहन, सीधी राजनीतिक घेराबंदी

इंडिया गठबंधन की पार्टियां—भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन—ने संयुक्त रूप से कार रोड चौराहे पर प्रदर्शन किया। भाजपा सरकार और विधायक का पुतला दहन कर निंदा प्रस्ताव पारित किया गया।
वक्ताओं ने आरोप लगाया कि 18 फरवरी की रैली को कमजोर करने के लिए 25 फरवरी का भरोसा दिया गया। “जनता की उम्मीदों से खेला गया,” यह कहते हुए विधायक से सार्वजनिक माफी की मांग उठी।

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जश्न बनाम जनसंवेदना

सबसे तीखा सवाल यही—जब हजारों परिवार अपने हक की आस में बैठे हों, तब जनप्रतिनिधि का निजी जश्न क्या संदेश देता है?
राजनीतिक तंज साफ है—“नेता वही जो जनता के संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाए। जनता आक्रोश में हो और नेता जश्न में, तो यह संवेदनशीलता नहीं, सियासी दूरी है।”

 

अल्टीमेटम की राजनीति

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि 9 मार्च से गैरसैंण में शुरू हो रहे विधानसभा सत्र में यदि राजस्व गांव का विधिवत प्रस्ताव नहीं लाया गया, तो आंदोलन उग्र होगा। 30 अप्रैल 2026 तक अधिसूचना जारी न होने पर 1 मई से नए जनआंदोलन का ऐलान किया गया है।
संदेश स्पष्ट है: अब तारीखों और बयानों की राजनीति नहीं चलेगी। जनता को जश्न नहीं, जमीन पर फैसला चाहिए। अब देखना है—सत्ता सियासी दबाव में झुकेगी या सड़क की आग और भड़केगी?**

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