
राजू अनेजा,लालकुआं।लालकुआं विधानसभा क्षेत्र में इन दिनों बिंदुखत्ता को राजस्व गांव का दर्जा और जमीन पर मालिकाना हक का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। वर्षों से हजारों परिवार इस मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं। हर चुनाव में यह मुद्दा प्रमुखता से उठता है और नेताओं के मंचों से बड़े-बड़े वादे भी किए जाते हैं। चुनावी माहौल बनते ही यह मुद्दा फिर से जनता की जुबान पर आ गया है।
सदन से थी बड़ी उम्मीद
जब गैरसैंण में विधानसभा का बजट सत्र शुरू हुआ तो बिंदुखत्ता के लोगों को उम्मीद थी कि उनके जनप्रतिनिधि सदन में उनकी आवाज बनेंगे और राजस्व गांव की मांग को मजबूती से उठाएंगे। क्षेत्र की जनता चाहती थी कि सरकार से इस मुद्दे पर स्पष्ट जवाब मांगा जाए और वर्षों से लंबित इस समस्या के समाधान की दिशा में ठोस पहल हो।
सदन में क्यों छाई रही खामोशी
लेकिन जब विधानसभा में क्षेत्रीय मुद्दों को उठाने का मौका आया तो राजस्व गांव जैसे बड़े मुद्दे पर नेताजी की आवाज सुनाई नहीं दी। यही बात अब लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई है। क्षेत्र में जहां नेताजी की लोकप्रियता के किस्से सुनाए जा रहे हैं, वहीं सदन में इस अहम मुद्दे पर उनकी चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है।
सियासी गलियारों में तेज हुई चर्चा
नेताजी की इस खामोशी को लेकर लालकुआं के सियासी गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कुछ लोग इसे राजनीतिक रणनीति बता रहे हैं, जबकि कई लोग यह भी कह रहे हैं कि शायद इस बार नेताजी अपनी ही पार्टी में टिकट की दौड़ में पहले जैसी मजबूत स्थिति में नहीं हैं। ऐसे में यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि यही वजह इस चुप्पी के पीछे हो सकती है।
हजारों परिवारों की उम्मीदें अब भी कायम
बिंदुखत्ता के हजारों परिवार आज भी राजस्व गांव का दर्जा और जमीन पर मालिकाना हक मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। यह मुद्दा केवल सियासत का नहीं बल्कि लोगों के अधिकारों और उनके भविष्य से जुड़ा हुआ है। ऐसे में क्षेत्र की जनता की निगाहें अपने जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं कि आखिर उनकी आवाज सदन में कब और कौन बुलंद करेगा।
अब सवाल यही है—जब सदन में ही बिंदुखत्ता की आवाज नहीं उठेगी, तो आखिर राजस्व गांव की लड़ाई को अंजाम तक कौन पहुंचाएगा?

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