रोज की प्लानिंग, मंत्रियों का कैंप, मजदूरों को बाहर निकालने में किसका क्या रहा रोल?

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सिलक्यारा टनल में फंसे 41 मजदूरों को निकाल लिया गया है. सभी मजदूरों को मंगलवार देर शाम सुरंग से बाहर निकाला गया. ऑपरेशन 408 घंटे से ज्यादा चला. इसे बहुत बड़ी जीत के तौर पर देखा जा रहा है, लेकिन सबसे बढ़कर ये जीत है मजदूरों के जज्बे की.

उन मजदूरों की जिन्होंने 17 दिन से हार बिल्कुल नहीं मानी. हौसला नहीं छोड़ा.

इस ऑपरेशन में कितनी एजेंसियों ने काम किया और अपना तकनीक लगाया, सरकार के स्तर पर क्या-क्या हुआ यह कहानी भी बड़ी दिलचस्प है. एनडीएमए के सदस्य लेफ्टिनेंट जनरल सैय्यद अता हसनैन ने बताया, पूरे अभियान के दौरान सरकार ने सभी एजेंसियों को पूरी तरह से सुना. सबकी तकनीक पर यकीन किया तब कहीं जाकर इस अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सका.

एनएचएआई के मेम्बर विशाल चौहान ने कहा, इसके लिए जितनी भी सरकारी बाधाएं थी सभी को तत्काल प्रभाव से दरकिनार किया गया. बड़े लेवल पर अधिकारियों की फौज तैयारी की गई थी. उन्होंने कहा, देसी और विदेशी सभी तकनीकों का इसमें इस्तेमाल किया गया और जरूरत पड़ने पर विदेश से मशीन और एक्सपर्ट भी बुलाए गए.

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पीएमओ की दखल

पहले ही दिन से इस मामले पर प्रधानमंत्री की विशेष नजर थी. प्रधानमंत्री ने खुद टनल में फंसे मजदूरों को लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से समय-समय पर बात की. इसके अतिरिक्त पीएमओ के अधिकारी ने वहां डेरा डाल रखा था. जहां कहीं भी कोई तकनीकी सरकारी बाधा आई उसे फौरन दूर किया गया.

मंत्री ने वहीं कैम्प किया

केंद्रीय मंत्री जनरल वी के सिंह ने अपना अधिकतर समय वहीं बिताया. उन्होंने सभी एजेसियों के साथ समन्वय का काम किया. वी के सिंह खुद सेना में रहे हैं, ऐसे में जितने भी रुट हो सकते हैं जिससे कि मजदूरों को सकुशल निकाला जा सके उसके लिए कोशिश की. स्पॉट पर नितिन गडकरी भी पहुंचे थे.

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किन-किन एजेंसी की मदद

जानकारी के मुताबिक, मिनिस्ट्री आफ रोड ट्रांसपोर्ट, मिनिस्ट्री ऑफ रेलवे, इंडियन एयर फोर्स, एनडीआरएफ, मिनिस्ट्री ऑफ हेल्थ एंड फैमली वेलफेयर, बीआरो, डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्यूनीकेशन, एसडीआरएफ, बीएमस के साथ लोकल एडमिनिशट्रेशन की मदद ली गई.

राज्यों और पीएसयू की भी मदद

इस अभियान में देश के कई पीएसयू ने भी काफी अहम भूमिका निभाई जिसमें एनएचआईडीसी, सतलज जल विद्युत निगम, आरएनवीएल, ओएनजीसी, टिहरी हायड्रोपावर शामिल है. इसके साथ कई राज्यों से भी मदद ली गई जिसमें राजस्थान, ओडिशा, झारखंड, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, दिल्ली शामिल थे.

रोज होती थी प्लानिंग

विशाल चौहान ने बताया, सचिव रोड ट्रांसपोर्ट इसे लेकर हर दिन बैठक करते थे. मसलन किसी मशीन को कैसै स्पॉट तक पहुंचाना है. उसके लिए ग्रीन कॉरीडोर तैयार किया जाता था. इंडियन एयरफोर्स से लेकर रेलवे तक लोडिंग अनलोडिंग पर चर्चा की जाती थी. इतना ही नहीं यदि किसी मशीन को रोड से वहां तक पुंचाना है तो जिस-जिस जिले से वो मशीन गुजरती थी वहां के डीएम और एसपी से बात करते ग्रीन कॉरोडोर बनाया जाता था.

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पैसे की कोई कमी नहीं

विशाल चौहान ने बताया, सभी एजेंसियों को पहले ही दिन यह क्लियर कर दिया गया था कि पूरे अभियान में पैसे की कोई कमी नहीं है. वह चाहे तो सीएसआईआर फंड से पैसे का उययोग कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि एजेसिंयो को यह भी बताया गया कि वह बाद में अपना पैसा क्लेम भी कर सकते हैं. इसके लिए जितने भी रेड टैपिज्म थे उसे तत्काल दूर किया गया.

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