विश्व पर्यावरण दिवस 2026: ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ा एल नीनो का खतरा; प्रो. विंध्यवासिनी पांडेय की चेतावनी— ‘जिस डाली पर बैठे हैं, मानव समाज उसी को काटने में जुटा’

खबर शेयर करें -

मेरठ/दिल्ली: विश्व पर्यावरण दिवस 2026 इस बार एक ऐसे नाजुक मोड़ पर मनाया जा रहा है, जब संपूर्ण मानव सभ्यता और पृथ्वी जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के सबसे गंभीर दौर से गुजर रहे हैं। लगातार बढ़ता वैश्विक तापमान, अनियमित मानसूनी वर्षा, सूखा, भीषण बाढ़, जंगलों में धधकती आग (वनाग्नि) और मौसम के बदलते हिंसक स्वरूप ने पर्यावरणविदों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। इस वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस की आधिकारिक थीम ‘प्रकृति से प्रेरित, जलवायु के लिए, हमारे भविष्य के लिए’ निर्धारित की गई है।

इस अवसर पर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिमालय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. विंध्यवासिनी पांडेय ने वर्तमान वैश्विक हालात, बढ़ते कार्बन उत्सर्जन और एल नीनो (El Nino) के घातक प्रभावों को लेकर बेहद गंभीर विधिक व वैज्ञानिक चिंताएं प्रकट की हैं।

1.5 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा पृथ्वी का औसत तापमान; ठंडे देश भी गर्मी से बेहाल

प्रो. विंध्यवासिनी पांडेय ने वैज्ञानिक आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि प्रकृति सदैव अपने स्तर पर पूरे इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) में संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में अंधी औद्योगिक क्रांति और विकास की अंधी दौड़ ने प्रकृति पर असहनीय दबाव बढ़ा दिया है।

  • ग्रीनहाउस गैसों में रिकॉर्ड वृद्धि: पिछले सौ वर्षों में कार्बन डाइऑक्साइड ($CO_2$) और अन्य विनाशकारी ग्रीनहाउस गैसों के अंधाधुंध उत्सर्जन के कारण पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रांति के बाद से अब तक लगभग $1.5^\circ\text{C}$ तक बढ़ चुका है।

  • वैश्विक हीटवेव: इसी का नतीजा है कि आज मामूली तापमान वृद्धि भी दुनिया के कई देशों में जानलेवा हीटवेव (लू) का कारण बन रही है, जिससे जल स्रोत सूख रहे हैं और खेती तबाह हो रही है।

  • यूरोप-इंग्लैंड में हाहाकार: जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। यूरोप और इंग्लैंड जैसे ठंडे देशों में भी पारा $35^\circ\text{C}$ से $40^\circ\text{C}$ रिकॉर्ड स्तर को छू रहा है, जो बेहद चिंताजनक विधिक व पर्यावरणीय संकेत है।

क्या है ‘एल नीनो’ और भारत के मानसून पर इसका घातक असर?

जलवायु संकट के वैज्ञानिक विश्लेषण में प्रो. पांडेय ने ‘एल नीनो’ को इस समय की सबसे बड़ी और जरूरी चुनौती करार दिया।

  • समुद्री तापमान में बदलाव: एल नीनो मूल रूप से प्रशांत महासागर में समुद्री जल के तापमान और वायुदाब में होने वाला एक बड़ा क्रमिक बदलाव है। सामान्य दिनों में प्रशांत महासागर का पूर्वी भाग (अमेरिका तट) ठंडा और पश्चिमी भाग (एशिया तट) गर्म रहता है, जिससे एशिया में निम्न वायुदाब बनता है और मानसून मजबूत होता है।

  • उलट जाती है स्थिति: एल नीनो के दौरान स्थिति पूरी तरह उलट जाती है। अमेरिका के पास समुद्र का पानी अत्यधिक गर्म हो जाता है और एशियाई क्षेत्रों में उच्च वायुदाब बनने लगता है, जो सीधे तौर पर मानसूनी हवाओं की गति को कमजोर कर देता है।

  • भारतीय अर्थव्यवस्था पर संकट: चूंकि भारत की संपूर्ण कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और जल संसाधन काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर टिकी हैं, इसलिए एल नीनो के कारण सूखा पड़ने से खाद्य उत्पादन गिर जाता है। इसका सीधा और घातक असर देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP), बिजली उत्पादन और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

रेगिस्तान में बर्फबारी और पूर्व-पश्चिम भारत में बदला वर्षा का पारंपरिक चक्र

निदेशक प्रो. पांडेय ने कहा कि ग्लोबल वार्मिंग ने मौसम के पारंपरिक चक्र को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है। एक ओर जहां अमेज़न, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के विशाल जंगलों में भीषण सूखे के कारण वनाग्नि की घटनाएं बेकाबू हो रही हैं, वहीं दूसरी ओर रेगिस्तानी देशों में अप्रत्याशित रूप से भारी बारिश और बर्फबारी देखने को मिल रही है।

खुद भारत में भी इसका व्यापक असर साफ दिखने लगा है; जो पूर्वी भारत ऐतिहासिक रूप से सर्वाधिक वर्षा के लिए विख्यात था, वहां अब सूखा दिख रहा है और पश्चिमी भारत के शुष्क क्षेत्रों में अत्यधिक और विनाशकारी वर्षा की घटनाएं अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई हैं।

यह केवल पर्यावरण नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का संकट: अनुकूलन ही एकमात्र मार्ग

पर्यावरणविद प्रो. पांडेय ने नीतिगत चेतावनी देते हुए स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन को केवल एक ‘पर्यावरणीय समस्या’ मान लेना मानव समाज की सबसे बड़ी भूल होगी। वास्तव में यह मनुष्य के स्वयं के अस्तित्व, सामाजिक स्थिरता और भविष्य की पीढ़ियों का संकट है। ‘जलवायु’ शब्द स्वयं ‘जल’ और ‘वायु’ से मिलकर बना है, जो जीवन के मूल आधार हैं।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रकृति पर विजय प्राप्त करने की साम्राज्यवादी और हठधर्मी मानसिकता को अब तुरंत त्यागना होगा। हमें ऐसा सतत विकास (Sustainable Development) अपनाना होगा जो पर्यावरण के साथ सामंजस्य बिठा सके, क्योंकि प्रकृति के साथ अनुकूलन स्थापित करना ही अब भविष्य का एकमात्र विधिक रास्ता बचा है।

डाली काटने जैसी भूल सुधारनी होगी; जल संरक्षण और वृक्षारोपण बने जन-आंदोलन

संकट के विधिक समाधानों पर जोर देते हुए प्रो. विंध्यवासिनी पांडेय ने बड़े पैमाने पर सघन वृक्षारोपण, सिंगल-यूज प्लास्टिक पर पूर्ण विधिक नियंत्रण, कार्बन उत्सर्जन में भारी कटौती और नदियों व मिट्टी को रसायनों से मुक्त करने की पुरजोर वकालत की। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण और स्वच्छता को केवल सरकारी फाइलों या कार्यक्रमों तक सीमित न रखकर एक राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन बनाना होगा।

“वर्तमान में मानव समाज की स्थिति ठीक वैसी ही हो गई है, जैसे कोई अज्ञानी व्यक्ति जिस पेड़ की डाली पर बैठा हो, उसी को कुल्हाड़ी से काटने लगे। ब्रह्मांड में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ज्ञात ग्रह है जहां जीवन फल-फूल रहा है। इसके सीमित संसाधनों का संरक्षण करना हम सबकी सामूहिक और विधिक जिम्मेदारी है। यदि हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, तभी प्रकृति हमारा संरक्षण करेगी; अन्यथा प्रकृति के विनाश का अंतिम और भयावह दुष्परिणाम मानव सभ्यता के पूर्ण अंत के रूप में सामने आएगा।”

प्रो. विंध्यवासिनी पांडेय, निदेशक, हिमालय अध्ययन केंद्र (DU)