लुटियंस दिल्ली की ‘अदृश्य सत्ता’ पर बड़ी चोट: जिमखाना क्लब खाली करने का आदेश; अंग्रेजों के बनाए एलीट अड्डों, नेटवर्क और रसूख के साम्राज्य पर पहली बार उठा सवाल

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नई दिल्ली: देश की राजधानी दिल्ली में इस बार एक ऐसी दुनिया पर कानूनी और प्रशासनिक हथौड़ा चला है, जहां कभी बुलडोजर ले जाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। दशकों से देश की ‘स्थायी सत्ता’ और एलीट क्लास का सबसे सुरक्षित किला माने जाने वाले दिल्ली जिमखाना क्लब को खाली करने का आदेश जारी हुआ है। यह कार्रवाई महज़ एक इमारत या जमीन को वापस लेने भर की नहीं है, बल्कि लुटियंस दिल्ली के उस रसूखदार नेटवर्क को हिलाने की कोशिश है जिसके बारे में माना जाता था कि देश में सरकारें चाहे जिसकी आएं, इनका रूतबा कभी कम नहीं होता। अंग्रेज चले गए, वायसराय हाउस राष्ट्रपति भवन बन गया, और आईसीएस (ICS) बदलकर आईएएस (IAS) हो गया, लेकिन सत्ता की जो सामाजिक बनावट और रईसी का ढांचा था, वह जस का तस बना रहा। जिमखाना क्लब पर हुई इस कार्रवाई ने अब दिल्ली के गोल्फ क्लब, आईआईसी और आईएचसी जैसे उन तमाम औपनिवेशिक अड्डों के भविष्य पर भी सवालिया निशान लगा दिया है।

1913 में साम्राज्य का ‘सामाजिक मुख्यालय’ था इम्पीरियल जिमखाना

दिल्ली जिमखाना क्लब का इतिहास 1913 से जुड़ा है, जब अंग्रेजों ने इसे ‘इम्पीरियल दिल्ली जिमखाना क्लब’ के नाम से स्थापित किया था। ब्रिटिश काल में यह क्लब ब्रिटिश साम्राज्य का एक तरह से सामाजिक मुख्यालय हुआ करता था, जहां बैठकर यह तय किया जाता था कि कौन सभ्य है, कौन प्रभावशाली है और किसकी पहुंच वायसराय तक है। आजादी मिलने के बाद क्लब के साइनबोर्ड बदल गए, गोरे साहबों की जगह भूरे साहब आ गए, लेकिन अंदर का मिजाज और औपनिवेशिक ढांचा बिल्कुल वैसा ही रहा। दिल्ली के सबसे महंगे और रसूखदार इलाके में फैली हजारों करोड़ की इस सरकारी जमीन पर दशकों से उस वर्ग का एकाधिकार रहा है, जिसे अपना प्रभुत्व बनाए रखने के लिए कभी चुनाव लड़ने की जरूरत नहीं पड़ी। इस क्लब की सदस्यता पाना देश में आईएएस (IAS) बनने से भी ज्यादा कठिन माना जाता है, क्योंकि यह सदस्यता केवल एक खेल सुविधा नहीं, बल्कि सत्ता के सबसे ऊंचे ‘एलीट सर्किल’ में शामिल होने का सामाजिक हैसियत प्रमाणपत्र है।

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गोल्फ क्लब से लेकर आईआईसी तक: सत्ता, पूंजी और विमर्श के अभेद्य गढ़

जिमखाना तो सिर्फ एक शुरुआत है, दिल्ली की सियासत और ब्यूरोक्रेसी के बीच ऐसे कई और अभेद्य गढ़ हैं जिनकी कहानियां लगभग एक जैसी हैं:

  • दिल्ली गोल्फ क्लब: विशाल सरकारी जमीन पर फैला यह क्लब सिर्फ खेल का मैदान नहीं, बल्कि देश के शीर्ष कॉर्पोरेट और राजनीतिक आकाओं के बीच अरबों रुपये की डील्स और रिश्ते तय करने का सबसे बड़ा मिलन स्थल है।

  • इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC): बाहर से यह एक सांस्कृतिक और बौद्धिक संस्थान दिखता है, लेकिन भीतर यह सेवानिवृत्त सत्ता का पुनर्जन्म केंद्र है। यहां पूर्व सचिव, पूर्व राजदूत और आयोगों के पूर्व प्रमुखों का वह पुराना नेटवर्क जीवित रहता है जो पर्दे के पीछे से नीतियां प्रभावित करता है।

  • इंडिया हैबिटेट सेंटर (IHC): यहां कॉर्पोरेट, मीडिया, एनजीओ और नीतिगत थिंक-टैंक का ऐसा मिश्रण है, जहां देश की ‘लिबरल बातचीत’ जन्म लेती है। वातानुकूलित (AC) हॉलों में बैठकर देश की गरीबी और असमानता पर सेमिनार होते हैं और कॉफी टेबल पर सामाजिक न्याय के मसौदे निपटाए जाते हैं।

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बड़ा सवाल: गरीब हमेशा अस्थायी और रसूखदार हमेशा स्थायी क्यों?

इस पूरे घटनाक्रम ने दिल्ली की उस सबसे कड़वी और दिलचस्प सच्चाई को उजागर कर दिया है, जहां एक गरीब आदमी (मजदूर या रिक्शावाला) हमेशा अस्थायी होता है और अमीर हमेशा के लिए स्थायी। सड़क किनारे रेहड़ी-पटरी लगाने वाले या झुग्गी में रहने वाले गरीब से प्रशासन हर रोज पूछता है कि ‘यहां से कब हटोगे?’ लेकिन महज़ एक-दो रुपये सालाना के टोकन किराये पर हजारों करोड़ की बेशकीमती सरकारी जमीन घेरकर बैठे इन एलीट क्लबों से दशकों तक किसी ने यह नहीं पूछा कि ‘आपका एग्रीमेंट कब खत्म हो रहा है?’

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अब पहली बार देश के लोकतंत्र में यह बुनियादी सवाल पूछा जाने लगा है कि क्या लोकतंत्र सिर्फ आम जनता के पांच साल में एक बार वोट डालने तक सीमित रहेगा या सत्ता के इन मखमली सामाजिक अड्डों के भीतर भी दाखिल होगा। यदि जिमखाना क्लब से शुरू हुई यह कानूनी और प्रशासनिक जांच आगे बढ़ती है, तो आने वाले दिनों में उस अदृश्य और मजबूत व्यवस्था की परतें खुलेंगी जिसमें कुछ चुनिंदा लोग हमेशा इस राष्ट्र के ‘मालिक’ बने रहे और देश की बाकी जनता सिर्फ एक ‘किरायेदार’ की तरह जीती रही।