नमाज़ में छिपे हैं कई योगासन! खुदा की इबादत के साथ पूरे शरीर की भी हो जाती है कसरत : एडवोकेट नदीम उद्दीन

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राजू अनेजा,काशीपुर। नमाज़ केवल इबादत का माध्यम ही नहीं, बल्कि शरीर को सक्रिय और स्वस्थ रखने का भी एक प्रभावी जरिया है। यह बात अधिवक्ता एवं 45 कानूनी व जागरूकता पुस्तकों के लेखक नदीम उद्दीन ने कही। उन्होंने दावा किया कि मुसलमान 1400 वर्षों से अधिक समय से नमाज़ के माध्यम से ऐसे शारीरिक अभ्यास करते आ रहे हैं, जिनकी कई मुद्राएं योगासनों से मेल खाती हैं।

नदीम उद्दीन ने बताया कि योग किसी एक धर्म विशेष की संपत्ति नहीं है, बल्कि विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों में इसके तत्व अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मुसलमान के लिए पांच वक्त की नमाज़ अनिवार्य है और नमाज़ की विभिन्न अवस्थाओं में वज्रासन, भू-नमन आसन, हस्तपादासन, दक्षासन तथा सूर्य नमस्कार की कुछ मुद्राओं जैसी शारीरिक स्थितियां देखने को मिलती हैं। उनका कहना है कि नियमित रूप से नमाज़ अदा करने वाले व्यक्ति दिनभर में कई बार इन मुद्राओं का अभ्यास करते हैं, जिससे शरीर के विभिन्न अंग सक्रिय रहते हैं।

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उन्होंने बताया कि नमाज़ के बाद पढ़ी जाने वाली तस्बीह के दौरान भी उंगलियों और अंगूठे के विशेष स्पर्श से ज्ञान मुद्रा, पृथ्वी मुद्रा, वरुण मुद्रा, आकाश मुद्रा और वायु मुद्रा जैसी योग मुद्राओं से मिलती-जुलती स्थितियां बनती हैं। इन मुद्राओं को मानसिक एकाग्रता, शारीरिक संतुलन और स्वास्थ्य लाभ से जोड़कर देखा जाता है।

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नदीम उद्दीन ने कहा कि उनकी पुस्तक ‘सेहत व खुशहाली के लिए नमाज़, रोज़ा, ज़कात’ के नवीनतम संस्करण में इस विषय पर विशेष रूप से दो अध्याय जोड़े गए हैं। इनमें ‘योगासन और नमाज़’ तथा ‘तस्बीह और योग मुद्राएं’ शीर्षक से विस्तारपूर्वक जानकारी दी गई है। पुस्तक में नमाज़ की विभिन्न अवस्थाओं और योगासनों के बीच समानताओं का उल्लेख करते हुए उनके संभावित स्वास्थ्य लाभों को भी समझाया गया है।

उन्होंने बताया कि पुस्तक में वज्रासन को पाचन तंत्र के लिए लाभकारी, घुटनों व पैरों की मजबूती तथा शारीरिक संतुलन के लिए उपयोगी बताया गया है। वहीं भू-नमन आसन, पादहस्तासन, दक्षासन और नमस्कारासन जैसी मुद्राओं के स्वास्थ्य संबंधी लाभों की भी जानकारी दी गई है।

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नदीम उद्दीन के अनुसार नमाज़ और योग, दोनों का मूल उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से संतुलित बनाना है। उन्होंने कहा कि इबादत के साथ-साथ यदि व्यक्ति का शरीर भी सक्रिय और स्वस्थ रहता है तो यह समाज के लिए सकारात्मक संदेश है। उनकी पुस्तक का नवीन संस्करण ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध है।

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